<p style="text-align: justify;"><strong>Side Effects Of Excessive Screen Time:</strong> आज की दुनिया में मोबाइल, लैपटॉप और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुके हैं कि बिना स्क्रीन के कुछ घंटे बिताना भी मुश्किल लगने लगा है. सुबह आंख खुलते ही फोन और रात को सोने से पहले आखिरी नजर भी स्क्रीन पर ही जाती है. लेकिन डॉक्टरों और रिसर्च में अब लगातार यह चेतावनी दी जा रही है कि अगर समय रहते "डिजिटल डिटॉक्स" नहीं समझा गया, तो यह आदत धीरे-धीरे शरीर और दिमाग दोनों को बीमार बना सकती है. </p>
<p style="text-align: justify;"><strong>क्या होता है डिजिटल डिटॉक्स का मतलब?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">डिजिटल डिटॉक्स का मतलब है कुछ समय के लिए मोबाइल, सोशल मीडिया, लैपटॉप और बाकी डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाना, ताकि दिमाग और शरीर को लगातार मिलने वाले डिजिटल दबाव से राहत मिल सके. Aspenvalleyhealth के एक्सपर्ट मानते हैं कि इसे सिर्फ नया ट्रेंड नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा जरूरी कदम मान है. </p>
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<p style="text-align: justify;"><strong>बढ़ रही है इससे दिक्कत?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">डॉक्टरों के मुताबिक, लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से लोगों में नींद की समस्या, तनाव, सिरदर्द, आंखों में जलन और चिड़चिड़ापन तेजी से बढ़ रहा है. देर रात तक फोन चलाने की आदत दिमाग को आराम नहीं करने देती. सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की "परफेक्ट जिंदगी" देखने से तुलना की भावना बढ़ती है, जिससे आत्मविश्वास और मानसिक शांति दोनों प्रभावित होते हैं. रिसर्च में यह भी पाया गया है कि लगातार फोन चेक करने की आदत दिमाग की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कमजोर करती है. कई लोग बिना वजह बार-बार मोबाइल देखने लगते हैं. यहां तक कि फोन पास न होने पर बेचैनी, घबराहट और तनाव महसूस होने लगता है. एक्सपर्ट इसे डिजिटल निर्भरता का शुरुआती संकेत मानते हैं. </p>
<p style="text-align: justify;"><strong>लगातार स्कीन देखने के क्या होते हैं नुकसान?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">लंबे समय तक स्क्रीन देखने का असर सिर्फ दिमाग पर नहीं, शरीर पर भी पड़ता है. "टेक नेक" यानी लगातार झुककर मोबाइल देखने की वजह से गर्दन दर्द, पीठ दर्द और सिरदर्द की समस्या बढ़ रही है. आंखों में सूखापन, धुंधला दिखना और रोशनी से परेशानी भी अब आम हो चुकी है. डॉक्टरों का कहना है कि कम उम्र के लोग भी अब ऐसी समस्याओं के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं, जो पहले ज्यादा उम्र में दिखाई देती थीं. सबसे बड़ा असर रिश्तों पर पड़ रहा है. एक ही घर में रहने वाले लोग घंटों मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, लेकिन आपस में बातचीत कम होती जा रही है. परिवार के साथ समय बिताने के बजाय लोग सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय रहते हैं. धीरे-धीरे घर में चुप्पी, दूरी और तनाव बढ़ने लगता है. यही वजह है कि एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि अगर डिजिटल आदतों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो घर का माहौल भी मानसिक तनाव का कारण बन सकता है. </p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कैसे कर सकते हैं इसको ठीक?</strong></p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि राहत की बात यह है कि छोटी-छोटी आदतें बड़ा बदलाव ला सकती हैं. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि सुबह उठने के बाद कम से कम एक घंटा फोन से दूरी रखें. खाने के समय मोबाइल इस्तेमाल न करें और सोने से दो घंटे पहले स्क्रीन बंद कर दें. सप्ताह में एक दिन डिजिटल ब्रेक लेना भी दिमाग को राहत दे सकता है. रिसर्च में यह भी सामने आया है कि जब लोग कुछ समय के लिए प्रकृति, परिवार और वास्तविक बातचीत के साथ समय बिताते हैं, तो तनाव कम होता है, नींद बेहतर होती है और दिमाग ज्यादा शांत महसूस करता है.</p>
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<p><strong>Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.</strong></p>
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